शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

-10----लग्न--लग्नेश कीमती पत्थर कीमती पत्थर कीमती पत्थर कीमती पत्थर

लग्न                    लग्नेश                                              कीमती पत्थर   
  1. मेष            मंगल                                                  मूंगा
  2. वृष             शुक्र                                                    हीरा 
  3. मिथुन         बुध                                                    पन्ना  
  4. कर्क            चन्द्र                                                   मोती 
  5. सिंह            सूर्य                                                     सोना - माणिक 
  6. कन्या          बुध                                                     पन्ना 
  7. तुला            शुक्र                                                     हीरा 
  8. वृश्चिक         मंगल                                                   मूंगा 
  9. धनु             बृहस्पति                                               पुखराज 
  10. मकर           शनि                                                     नीलम , लोहा 
  11. कुम्भ            शनि                                                   नीलम , लोहा 
  12. मीन             बृहस्पति                                               पुखराज   
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मंगलवार, 12 जुलाई 2011

9 -- ग्रहों की उच्च - नीच राशि

9 -- ग्रहों की उच्च - नीच राशि
                                                                                  



ग्रह                               उच्च राशि                              नीच राशि
  1. सूर्य                                   1                                              7
  2. चन्द्र                                  2                                              8
  3. मंगल                               10                                             4
  4. बुध                                    6                                            12
  5. गुरु                                    4                                             10
  6. शुक्र                                   12                                            6
  7. शनि                                   7                                              1
  8. राहु                                     कोई नहीं                                   कोई नहीं 
  9. केतु                                    कोई नहीं                                    कोई नहीं                  
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8-- ग्रहों की मित्रता

8-- ग्रहों की मित्रता , शत्रुता या सम स्थिति

                                                                            

ग्रहों की मित्रता
सूर्य _ चन्द्र , मंगल और गुरु
चन्द्र _ सूर्य और बुध
मंगल _ सूर्य , चन्द्र और गुरु
बुध _  सूर्य , शुक्र और राहु
गुरु _  सूर्य , चन्द्र और मंगल
शुक्र _ बुध , शनि और राहु
शनि __ बुध , शुक्र और राहु
राहु __ बुध , शुक्र और शनि
केतु __ सूर्य , बुध , शुक्र और शनि


ग्रहों की शत्रुता
सूर्य __ शुक्र , शनि और राहु
चन्द्र __ राहु और केतु
मंगल __ बुध , राहु
बुध __ चन्द्र और गुरु
गुरु ___ बुध और शुक्र
शुक्र __ सूर्य - चन्द्र
शनि __ सूर्य , चन्द्र और मंगल
राहु __ सूर्य , चन्द्र और मंगल
केतु __ सूर्य , चन्द्र और मंगल


ग्रहों का सम - भाव
सूर्य __ बुध
चन्द्र __ मंगल , गुरु , शुक्र और शनि
मंगल ___ शुक्र और शनि 
बुध __ मंगल और शनि 
गुरु __ राहु और शनि 
शुक्र ___ मंगल और गुरु 
शनि ___ गुरु 
राहु __ गुरु 
केतु ___ गुरु 
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7-- भाव - सार

7-- भाव - सार

                                             
प्रथम भाव इसे जन्म-भाव 
इसमें वह राशि होती है , जो जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर जन्म स्थान पर उदय हो रही होती है .
इसमें जन्म की बातें , जन्म की जाति , शरीर का रंग , शरीर का कद . सिर , अपना आपा , सम्पूर्ण शरीर , आयु , रोग , यश एवं प्रतिष्ठा , उन्नति , धन , दिमाग आदि का विचार किया जाता है .

द्वितीय- भाव __ धन-भाव
इससे धन , कुटुंब , माता के बड़े भाई- बहन , वाणी - मुख . मारक - विचार , राज - पुत्र , राज्य - सभा , आँख आदि का विचार किया जाता है.

तृतीय - भाव __ श्रम- भाव 
इसको भात्रि या सहज - भाव कहते हैं , इससे छोटे-भाई -बहन , मित्र , पड़ौसी , छोटी यात्रा , अपना आपा , बाहु , सांस की नली , साहस , श्रम इत्यादि का विचार किया जाता है .

चतुर्थ-भाव __ मन , इच्छा , रूचि वेदना
इसको माता का भाव भी कहते हैं . इससे जन्म-भूमि , रहने का मकान ( RESIDENCE ) , जायदाद , कृषि , पाताल , जनता , वाहन ( CONVEYNENCE ) इत्यादि का विचार किया जाता है .

पंचम- भाव _ बुद्धि , सन्तान
इसको पुत्र-भाव भी कहते हैं . इससे सन्तान , गर्भ , प्रतिभा , बुद्धि , इष्टदेव , प्रतियोगी परीक्षा , सट्टे का व्यापार , भाग्य , पिता का भाग्य , किसी के प्रेम में फंसना , बड़ी बहन का पति , पेट , ह्रदय आदि का विचार किया जाता है .

षष्ठ - भाव __ नीति , शत्रु , रोग , ऋण
यह नीति एवं व्यावहारिक ज्ञान का भाव है . इसको शत्रु-भाव भी कहते हैं . इससे शत्रु , क्षत ( चोट-घाव ) , ऋण , रकावट , अभाव , मामा , अंतड़ियाँ , कारागार , म्लेच्छ , अन्यत्व आदि का विचार किया जाता है .

सप्तम - भाव __ जाया या स्त्री , वीर्य
इस भाव से स्त्री , कामवासना , वीर्य , पति , मूत्रेन्द्रिय , प्रयत्न , शूरता , व्यापार , यात्रा आदि का विचार किया जाता है .

अष्टम - भाव ___ आयु , मृत्यु
इसको आयु या मृत्यु भाव कहते हैं . इससे मृत्यु के कारण , गम्भीर बीमारी , विदेश , महा कष्ट , नाश , पुरातत्त्व , पाप , अंडकोष , बड़े मामा की पत्नी आदि पर विचार किया जाता है . 

नवम- भाव ___ धर्म या भाग्य  
इसको भाग्य या धर्म भाव कहत हैं . इससे भाग्य , धर्म का विचार किया जाता है . इसमें व्यवसाय , उन्नति , पिता , शुभ कर्म , पुत्र , उच्च विद्या , अध्यात्म - योग के साथ-साथ नितम्ब , छोटे भाई की पत्नी , छोटी बहन का पति , पत्नी का छोटा भाई , तप , उच्च विचार आदि का विचार किया जाता है .


दशम- भाव__ धार्मिक- कार्य

परन्तु धर्म धार्मिक भाव के बिना टिक नहीं सकता . यही कारण है कि दशम - भाव से ' धार्मिक कर्म ' का विचार किया जाता है . इन्हीं धार्मिक कार्यों ( MERITORIOUS DEEDS ) धर्म की महत्ता बढ़ती है . इसके अंतर्गत यज्ञीय कर्म , सेवा-कार्य , वर्णाश्रम उचित कर्म , परोपकार आदि आते हैं .
ता है . 

एकादश - भाव __ लाभ या निष्काम कर्म 
यह लाभ भाव है . इससे धन की प्राप्ति , बड़ा भाई - बहिन , ऊंचाई , टांग का निचला भाग , पुत्रवधू , दामाद , चोट-रोग आदि का विचार किया जाता है .

द्वादश - भाव __ मोक्ष या व्यय एवं अपव्यय
इसको मोक्ष - भाव के साथ - साथ संसारिकता में व्यय या अपव्यय का भाव कहते हैं . इसमें आँख , त्याग , मामी , नींद , कम-सुख , कारागार एवं प्रथकता आदि पर विचार दशम - भाव __  कर्म या धार्मिक कार्य
इसको कर्म या धार्मिक भाव कहते हैं . इससे मनुष्य के अच्छे-बुरे , कामधंधा , पैत्रिक सम्पत्ति , राज्य , राजा का यश, मान -सम्मान ,प्रशंसा आदि पर विचार किया जाकिया जाता है .*******
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'6-- ' भाव ' का स्वरूप

6-- ' भाव ' का स्वरूप

                                              


प्रथम -  भाव-- जन्म या रूप   --- जन्म  मनुष्य का जन्म उसके लिए इस संसार में सबसे पहली घटना है . जीवन की शेष क्रियाएं तथा घटनाएँ ' जन्म ' के अनन्तर ही होती है . अत: ' जन्म ' को प्रथम भाव के साथ जोड़ना ऋषियों की तार्किक प्रतिभा का परिणाम था . वास्तविकता यह है कि प्रत्येक उस वस्तु , अंग , स्थिति , पदार्थ का ; जो जन्म से ही मनुष्य को प्राप्त हो जाती है , उसके जन्म भाव अर्थात लग्न भाव अथवा पहले भाव से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है . और उसका विवेचन जन्म भाव से ही किया जाता है . उदाहरण के लिए मनुष्य को उसका रंग-रूप (FEATURES ) , कद ( STRUCTURE )  उसकी जाति _ ब्राह्मण , क्षत्रिय आदि , जन्म - स्थान , जन्म का समय आदि सब बातें जन्म में प्राथमिकता ( TOP PRIORITY ) रखती  हैं . अत: इन सब का विचार मनुष्य के शरीर के साथ - साथ सबसे पहले भाव अर्थात जन्म-भाव से ही किया जाता है .


द्वितीय - भाव __ भोग्य या धन  __जब किसी जातक को जन्म मिल चुकता है तो सबसे आवश्यक बात जो उसके जीवन - मरण से सम्बन्ध रखती है , वह है उसके लिए भोज्य अथवा भोग्य सामग्री .  इससे दूसरे भाव का विचार किया जाता है . भोग्य - सामग्री से सम्बन्ध होने के कारण दूसरे भाव को ' धन - भाव ' भी कहते हैं .  


तीसरा भाव _ बाहु या श्रम __
 
कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार द्वितीय भाव से सम्बन्ध रखने वल्र खाद्य पदार्थ आदि शरीर - यात्रा अर्थात प्रथम भाव के लिए अनिवार्य हैं , उसी प्रकार तृतीय भाव ' श्रम ' द्वितीय भाव के 'धन ' की उत्पत्ति एवं स्थिरता के लिए अनिवार्य है . काम तो बहुधा हाथों से ही अथवा बाहुबल से ही होता है , अत: तृतीय भाव बाहु का है . यही स्थान भाइयों का भी है . क्योंकि भाई को बाहु माना गया है . इस प्रकार तृतीय भाव श्रम का भाव नैसर्गिक विकास-क्रम से सिद्ध होता है .

चतुर्थ _ भाव _  इच्छा , रूचि और वेदना __  जब तक किसी कार्य में मनुष्य की रूचि अथवा इच्छा न हो तब तक उस कार्य में प्रवृत्ति नहीं होती . कहा भी है _ ' WHERE THERE IS WILL THERE IS WAY ' अर्थात जहाँ इच्छा -शक्ति होती है वहां कार्य-निष्पन्न होता है . अत: चतुर्थ - भाव का ' इच्छा , रूचि , वेदना ' ( WILL , DESIRES , EMOTIONS ) आदि का प्रतिनिधित्व करके मन-रूप होना ही विकास-क्रम में उपयुक्त ही है ; क्योंकि इस गुण-विनियोग द्वारा तृतीय स्थान को सहायता मिलती है और मनुष्य ऊंचा उठता चला जाता है . 


पंचम -भाव _ बुद्धि __ 
 प्रथम - भाव शरीर के लिए दितीय -भाव धन- पदार्थ होते हुवे भी और उसके लिए तृतीय-भाव श्रम करते हुवे भी एवं इस श्रम के लिए चतुर्थ - भाव रूचि व मानसिक शक्ति रखता हुवा भी मनुष्य जीवन में विकास की ओर अग्रसर नहीं हो सकता . यदि उसको अपना प्राप्तव्य उद्देश्य व गन्तव्य स्थान का ज्ञान न हो . अत: बुद्धि-तत्व उपरोक्त धन, श्रम , रूचि तत्व से भी अधिक मूल्यवान , आवश्यक व मौलिक  है . 
बिना बुद्धि में निश्चय हुवे मानसिक प्रवृत्ति नहीं हो सकती .  बिना पंचम भाव- बुद्धि के चतुर्थ-भाव मन-रूचि का काम नहीं चलता . इस प्रकार ' बुद्धि , विचार , मंत्रणा ' तथा तदनुरूप बातों के लिए विद्या - परीक्षाएं ( COMPETETIVE EXAMS ) आदि का पंचम-भाव से सम्बन्ध होना विकास-क्रम में उपयुक्त ही है .

षष्ठ -भाव _ क्रियात्मक -ज्ञान या नीति __  यदि जातक के पास अच्छा शरीर , खूब धन , पर्याप्त श्रम , स्वस्थ मन एवं तीक्ष्ण बुद्धि सभी कुछ हो , परन्तु उसे संसार का क्रियात्मक अनुभव ( PRACTICAL EXPERIENCE AND KNOLEDGE ) न  हो तो उसे सफलता प्राप्त नहीं हो सकती . नीति का ज्ञान उसके लिए बहुत आवश्यक है . यदि संसार की प्रति-स्पर्धा या होड़ से , शत्रुता से , अड़चनों से , विरोधी शक्तियों से वह व्यक्ति अनभिज्ञ है , तो कहना पड़ेगा कि उसका विकास अभी सैद्धांतिक ( THEORETICAL ) ही है , व्यावहारिक नहीं . अत: आपत्तियों , अड़चनों , विरोधी तत्त्वों का बुद्धि आदि के विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान है .
जब मनुष्य क्रियात्मक रूप से संसार में कठिनाइयों का सामना करता है तो तभी विकास में उत्तीर्ण समझा जाता है . अत; अड़चनों . कठिनाइयों , शत्रुता , रोग , ऋण आदि को छठे स्थान संयुक्त करना उचित ही प्रतीत होता है . वास्तव में नीति के बिना गति भी नहीं है .

सप्तम- भाव _ वीर्य एवं स्त्री भाव
मनुष्य शत्रुता , अडचनों , रुकावटों को तभी जीत सकता है , जबकि उसमें इच्छा , विद्या आदि के साथ-साथ वीर्य की शक्ति भी हो . नपुंसक व्यक्ति इच्छा , विद्या आदि का क्या प्रयोग करेगा ? और कैसे शत्रुओं आदि पर विजय प्राप्त करेगा ? यही कारण है कि विकास-क्रम में षष्ठ शत्रु स्थान भाव के अनन्तर वीर्य सप्तम भाव को रखा गया है .
वीर्य से सम्बन्ध वस्तुएं जैसे _ स्त्री , गुप्तेन्द्रिय , गुप्तेन्द्रिय का कार्य ( SEX ACTION )इत्यादि भी इसी सप्तम भाव से देखे जाते हैं .


अष्टम-भाव _ आयु आदि 
अब मान लो कि किसी व्यक्ति में वीर्य , अनुभव ,  विद्या , रूचि ,  परिश्रम , धन . स्वास्थ्य आदि सभी गुण हैं , परन्तु उसे शीघ्र ही मर जाना है तो वे सारे गुण उसके लिए किस काम के ? वह फिर जीवन के आदर्श को प्राप्त नहीं कर सकेगा . 
यही कारण है कि सप्तम भाव के अनन्तर अष्टम भाव में आयु से सम्बद्ध मरण आदि विधि का विचार किया जाता है . 

नवम- भाव _ धर्म , पुण्य एवं भाग्य 
' बड़े भाग मानुष तन पावा ' अर्थात मनुष्य शरीर महान भाग्य के बिना प्राप्त नहीं होता . विशेष रूप से यह शरीर जो विकास - साधना में जुटकर अपना तथा आत्मा का कल्याण चाहता है तो यह बड़े पुण्य का परिणाम है . अत: भाग्य तथा पुण्यकर्म एवं धर्म का सम्बन्ध नवम भाव से युक्तियुक्त ही है .
   
दशम- भाव__ धार्मिक- कार्य
परन्तु धर्म धार्मिक भाव के बिना टिक नहीं सकता . यही कारण है कि दशम - भाव से ' धार्मिक कर्म ' का विचार किया जाता है . इन्हीं धार्मिक कार्यों ( MERITORIOUS DEEDS ) धर्म की महत्ता बढ़ती है . इसके अंतर्गत यज्ञीय कर्म , सेवा-कार्य , वर्णाश्रम उचित कर्म , परोपकार आदि आते हैं .

एकादश - भाव __ उपचय या निष्काम कर्म
स्पष्ट है कि मोक्ष के लिए निष्काम कर्म ही उपयुक्त हैं . सकाम कर्म तो स्वर्ग आदि नश्वर लोकों को प्राप्त करा सकते हैं . शाश्वत आनन्द की प्राप्ति नहीं करा सकते . अत: वह शुभ कार्य जो हमको सहज भाव से प्राप्त हो और जिसका उपचय हो चुका हो . अर्थात जो निष्काम कर्म हमारे इतने समीप हों कि हम नदियों - वृक्षों , वायु - प्रकाश की भांति उसे स्वाभाविक रूप से करें , बिना किसी निजी स्वार्थ के उस शुभ कार्य को एकादश परम उपचय भाव से सम्बद्ध किया गया है .

द्वादश - भाव __ मोक्ष

जब सब निष्काम कर्मों का उपचय एकादश- भाव में हो जाता है तो अगला पक्ष मोक्ष ही रह जाता है .
इस प्रकार स्पष्ट है कि ज्योतिष - शास्त्र में भाव और कुंडली का स्वरूप ' जन्म ' से लेकर ' मोक्ष ' तक मनुष्य के विकास की स्थिति है . योग - शास्त्र में कहा भी गया है _ भोग अपवर्ग अर्थम् दृश्यम ' अर्थात इस संसार में मनुष्य की स्रष्टि - कर्मों का भोग भोगने तथा मुक्ति प्राप्त करने के लिए की गयी है .*****

सोमवार, 11 जुलाई 2011

5 --नक्षत्रों का स्वामी ग्रह

5 --नक्षत्रों का स्वामी ग्रह

                                           


अस्तु , नीचे नक्षत्रों के स्वामी दिए गये हैं , ताकि पाठक यह समझ जाएँ कि किस नक्षत्र का किस ग्रह के अनुरूप अथवा अनुकूल फल होता है __
  1. उत्तराभाद्रपद ---
  2. मूला ---- केतु
  3. पूर्वाषाढ़ा ---- शुक्र
  4. उत्तराषाढ़ा ---- सूर्य
  5. श्रवण ----- चन्द्र
  6. रोहिणी ---- चन्द्र
  7. मृगशिरा ---- मंगल
  8. आर्द्रा ---- राहु
  9. पुनर्वसु ---- गुरु
  10. पुष्य ---- शनि
  11. अश्विनी ------   केतु
  12. भरणी -----     शुक्र
  13. कृतिका ------सूर्य
  14. आश्लेषा ---- बुध
  15. मघा ---- केतु
  16. पूर्वफाल्गुनी ---- शुक्र
  17. उत्तरफाल्गुनी ---- सूर्य
  18. हस्त ------  चन्द्र
  19. चित्रा  ----- मंगल
  20. स्वाती --- राहु
  21. विशाखा ---- गुरु
  22. अनुराधा ---- शनि
  23. ज्येष्ठा ---  बुध
  24. घनिष्ठा --- मंगल
  25. शतभिषा ---  राहु
  26. पूर्वाभाद्रपद ---- गुरु
  27. - शनि
  28. रेवती ----  बुध .

सूर्य --- 3 , 12 , 21
चन्द्र --- 4 , 13 , 22
मंगल --- 5 , 14 , 23
बुध ---- 9 , 18 , 27
गुरु ---- 7 , 16 , 25
शुक्र ---- 2 , 11 , 20
शनि ---- 8 , 17 , 26
राहु ---- 6 , 15 , 24
केतु ---- 1 , 10 , 19 .
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4-- ग्रह और उसके कारकत्व

4-- ग्रह और उसके कारकत्व

                                                          

नव ग्रहों में से प्रत्येक ग्रह संसार की वस्तुओं , जीवों , स्थितियों , संस्थाओं का कोई न कोई अंश अपने अंदर लिए हुवे है . अत: प्रत्येक ग्रह किन्हीं विशेष गुण-दोषों का प्रतिनिधित्व करता है और मनुष्य पर अपने प्रभाव द्वारा उसके अपने ही गुण-दोषों के अनुरूप बना देता है . इस तथ्य का वर्गीकरण करते हुवे हमारे ऋषियों ने इस सत्य को इस प्रकार व्यक्त किया कि अमुक ग्रह अमुक ' गुण ' , 'अवस्था ' , ' रंग ' , ' दिशा ' , 'धातु ' , ' अंग ' आदि का कारक है . इस कारकत्व का संक्षिप्त विवेचन निम्न प्रकार है _

  1. सूर्य __ आत्मा , पिता , राजा , हड्डी , आँख , ह्रदय , पेट , धनाड्य लोग , आग , उजाला , राज्य , नारंगी रंग , माणिक और पूर्व-दिशा .
  2. चन्द्र __ मन , माता , रानी , रक्त , आँख . फेफड़े , छाती , जनता , स्मरण शक्ति , आवेग तथा कामनाएं ( EMOTIONS AND DESIRES ) , पानी , श्वेत रंग , चांदी , मोती और उत्तर -पश्चिम दिशा .
    3 . मंगल __ वीरता , पुरुषार्थ , छोटे सगे भाई , रक्षा-विभाग , पट्ठे , सिर , अंडकोष , चोरी , क्षत , चातुर्य , हड्डी का आंतरिक भाग मज्जा ( MARROW OF THE BONE ) , हिंसा-प्रियता , मूंगा और दक्षिण दिशा .
    4 . बुध __  वाणी , बालक , त्वचा , व्यापारी , साँस की नली , अंतड़ियाँ , हरा रंग , मामा , बुद्धि-चेतना , तीनों धातु , मिश्रित वस्तु , खेल-कूद , हंसी - मजाक , नपुंसकत्व , कलई धातु , लिखना-पढ़ना और उत्तर दिशा .
    5 . बृहस्पति __ ज्ञान -गौरव , बडप्पन , चर्बी , जिगर ( LIVER ) , पीला रंग , बेटा , बड़ा सगा भाई , धन-दौलत , स्त्री की कुंडली में उसका पति , पैर , नितम्ब , राज्य कृपा , वायु , पुखराज और उत्तर -पूर्वी दिशा . 
    6 . शुक्र __ स्त्री , वीर्य , मुख , गला , गुप्तेन्द्रिय , पुरुषार्थ , काम-वासना , बढ़िया वस्तु , बढ़िया पसंद ( refined taste ) , प्रेम , संगीत , भागीदारी , जल , हीरा और दक्षिण-पूर्व दिशा . 
    7 . शनि __ स्त्रीलिंग , ठंडक , नपुंसकत्व , पत्थर , नौकर , नीच , श्रम , टांग का बीच वाला तथा निचला भाग , रोग , अंधकार , रकावट , पृथकता , विष , दीर्घ प्रभाव , अल्पगति , कर्कश वाणी , बैरागी , योगी , दार्शनिक , वायु-स्नायु - अभावात्मक , लोहा , पेट्रोल , चमडा व तेल तथा काला रंग . 
    8. राहु __ शरीर के अवयवों को छोड़कर प्राय: वे सब गुण और दोष राहु में हैं , जो कि शनि में पाए जाते हैं . इसीलिए ' शनिवत राहु ' कहा गया है . नीलम .
    9 .  केतु __ शरीर के अवयवों को छोड़कर , प्राय: वे सब गुण -दोष केतु में हैं , जो कि मंगल में हैं . ' मंगलवत केतु ' कहा गया है . मुक्ति .